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"व्यथा-ब्लैकिए की"
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rajiv taneja  
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 More options Jul 1, 3:17 pm
From: "rajiv taneja" <rajivtaneja2...@gmail.com>
Date: Tue, 1 Jul 2008 20:17:30 +0100
Local: Tues, Jul 1 2008 3:17 pm
Subject: "व्यथा-ब्लैकिए की"

<http://bp0.blogger.com/_gBWg3KQX_z0/SGp4EJBMMqI/AAAAAAAAAN4/YEYH4jOQq...>
"व्यथा-ब्लैकिए की"

"काला धन्धा गोरे लोग"

***राजीव तनेजा***

मैँ आप से...हाँ!..आप से...आप सभी से पूछना चाहता हूँ कि...

क्या ऊपर उठना या...उठने की चाह रखना गलत है?

क्या उन्नति के ख्वाब देखना...और उन्हें पूरा करने की भरसक कोशिश करते हुए आगे
बढना....

गुनाह है?...पाप है?...अपराध है?

अगर ये सब गलत है...सही नहीं है....तो मैँ दावे के साथ कह सकता हूँ कि दुनिया
का हर इन्सान..हर आदमी गलत है।

उसकी सोच ...उसकी विचारधारा...उसका चिंतन गलत है।

क्या आप अपने परिवार को फलता फूलता देख खुशी से फूले नहीं समाते?

या आप में आगे बढने...ऊँचा...और ऊँचा उठने की चाह हमेशा कुलाँचे नहीं भरती?

अगर!..यही सब बातें...यही सब गुण मुझ में भी कुदरती तौर पर मौजूद हैँ...उपलब्ध
हैँ...

तो इसमें गलत क्या है?...बुरा क्या है?

ठीक है!...माना कि जहाँ एक तरफ आपका चरित्र एकदम साफ-सुथरा...दूध का
धुला...बेदाग है और ....

वहीं दूसरी तरफ मुझ पर आए दिन कोई ना कोई केस दर्ज होता रहता है...

कभी मिट्टी के तेल की कालाबाज़ारी का...तो कभी सरकारी गेहूँ को दुकानदारों को
सप्लाई करने का

हाँ!...मैँ ब्लैकिया हूँ...और कालाबाज़ारी करना मेरा पेशा है।

मैँ मिट्टी के तेल से लेकर...गैस सिलैण्डर तक...हर उस चीज़ की कालाबाज़ारी करता
हूँ...जो डिमांड में होती है...माँग में होती है।

क्या कहा?...कानूनन जुर्म है ये?

हुँह!...जुर्म है....

है तो होता रहे ....मुझे परवाह नहीं।

आज इसी वजह से मैँ अच्छा खा रहा हूँ...अच्छा पी रहा हूँ...अच्छा पहन रहा
हूँ...अच्छा ओढ रहा हूँ...

तो आप सबको मिर्ची लगने लगी?

उस वक्त कहाँ थे आप?....

जब मैँ...मेरा परिवार बाज़ार में छाई गलाकाट प्रतियोगिता के चलते फैली मंदी के
कारण कई काम बदलने के बावजूद भुखमरी की कगार पे था?

मरता...क्या ना करता वाली कँडीशन थी मेरे सामने।....

बच्चे पालने के लिए जो रास्ता सही लगा..आसान लगा...उसी को अपनाता चला गया

तो क्या बुरा किया मैँने?

अब कुछ गिने-चुने सरफिरे लोग .....या चन्द पागल इसे गलत कहें...सही नहीं
समझें...

तो ये उनके दिमाग का कसूर है...मेरे दिमाग का नहीं।

मैँ कभी आप के आगे हाथ-पाँव जोड़ के विनति नहीं करता कि आप मेरे पास आ के अपनी
जेबें ढीली करवाएँ।

आप खुद अपनी गर्ज़ के चलते सौ-सौ धक्के खाने के बाद मेरी शरण में तब आते हैँ...

जब आप अपने नकारा सरकारी सिस्टम की पूरी तरह निराश हो चुके होते हैँ..हताश हो
चुके होते हैँ।

और ये कहाँ की भलमसत है कि आप मेरी शरण में आएँ और मैँ आपको दुत्कार दूँ?...या
बेइज़्ज़त कर के भगा दूँ?

शास्त्रों में भी लिखा है कि 'शरणागत' की रक्षा करना...उसका भला करना...धर्म का
काम है ...पुण्य का काम है।

तो ऐसे में मुझ जैसा धर्मभीरू आदमी भला अपने फर्ज़ से कैसे मुँह मोड़ ले?...

या किसी को परेशान देख...दुखी देख...अपनी आँखें मूंद ले?

आप कहते हैँ कि ये सिलैण्डरों की अल्टा-पलटी रिस्की काम है।

तो मेरे दोस्त!...ये बताओ कि रिस्क कहाँ नहीं है?....किस काम में नहीं है?...

आराम से अपनी राह चलते बन्दे भी बिना कसूर....बिना गलती के सिर्फ पाँव भर
फिसलने से ही मरते देखे हैँ मैँने।

ठीक है!...कई बार बड़े से छोटे सिलैण्डर में गैस भरने के दौरान ना चाहते हुए भी
हादसे हो जाया करते हैँ।...

इसमें चोट-चाट भी लग लगा जाती है और....

अब इसे वर्कलोड ज़्यादा होने के कारण कह लो या फिर...लापरवाही कह लो कि. ...

कई बार गैस वगैरा के लीक हो जाने से आग-वाग भी लग जाती है।

जिससे सिलैण्डरों के फटफटा जाने का खतरा भी हर हमेशा बना रहता है लेकिन ऐसा रोज़
थोड़े ही होता है?

ये तो जब 'टैंशन' के चलते कभी बीड़ी-बाड़ी की तलब उठती है और बिना सूट्टा मारे
रहा नहीं जाता है तब...

अब महीने दो महीने में एक-आधा विरला केस अखबारों में सुर्खियों बन छा भी गया तो
इसमें ना तो घबराने की ज़रूरत है और...

ना ही हाय-तौबा मचाने की।

वैसे तो हम लोगों की पूरी कोशिश रहती है कि ऐसी खबरें लीक ना हों और इन सब
बातों से पब्लिक में घबराहट ना फैले...'पैनिक' ना फैले लेकिन...

फिर भी यदि कोई तेज़ तरार मीडिया पर्सन सूँघसाँघ के मामले की जड़ तक पहुँचने की
कोशिश करता भी है तो उसे ले दे के चुप करा लिया जाता है।

हाँ!...थोड़ी बहुत...माड़ी-मोटी दिक्कत तब पेश आती है जब कोई जागरूक नागरिक ऐसे
मामलों को उठाने की कोशिश करता है।

तब रिश्वत के चलते बिकी हुई पुलिस अपना जलवा दिखा उसे किसी ना किसी तरीके शांत
कर देती है।

लेकिन गाहे-बगाहे कोई ना कोई ऐसा अड़ियल निकल ही बैठता है जिस पर....

पैसे का...प्यार का..लाड़ का...दुलार का...दबाव का कोई असर ही नहीं होता है।

तो ऐसे में कई बार फर्ज़ी केस कास भी दर्ज करने कराने पड़ जाते हैँ इन अड़ियल
टटुओं को सीधा करने के लिए।

ऐसा करना इसलिए भी निहायत ज़रूरी होता है कि बाकी के लोग इस सब से सबक लें और
इधर-उधर ताका-झाँकी के बजाए अपने काम से काम रखें।
...

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peekay  
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 More options Jul 6, 3:03 pm
From: "peekay" <pksharmakolk...@gmail.com>
Date: Mon, 7 Jul 2008 00:33:20 +0530
Local: Sun, Jul 6 2008 3:03 pm
Subject: Re: "व्यथा-ब्लैकिए की"

soooo much pain !

not a single respose !!

..peekay

...

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