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"अन्धा बाँटे रेवड़ियाँ"
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rajiv taneja  
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From: "rajiv taneja" <rajivtaneja2...@gmail.com>
Date: Tue, 6 May 2008 07:30:35 +0530
Local: Mon, May 5 2008 10:00 pm
Subject: "अन्धा बाँटे रेवड़ियाँ"

*"अन्धा बाँटे रेवड़ियाँ"*

***राजीव तनेजा***

"क्या हुआ?"...

"आते ही ना राम-राम..ना हैलो हाय"....

"बस सीधा बैग पटका सोफे पे और तुरन्त जा गिरे पलंग पे...धम्म से"...

"कम से कम हाथ मुँह तो धो लो"...

"अभी नहीं...थोड़ी देर में"..

"चाय बनाऊँ?"...

"नहीं!...मूड नहीं है"..

"क्या हुआ है तुम्हारे मूड को?"...

"जब से आए हो..कुछ परेशान से ...थके-थके से...लग रहे हो"..

"बस ऐसे ही"...

"फिर भी..पता तो चले"...

"कहा ना...कुछ नहीं हुआ है"...

"नहीं..कुछ तो ज़रूर है...मैँ नहीं मान सकती कि...

आप जैसा छोड़ू इनसान और...इस तरह चुपचाप बैठ जाए?"..

"हो ही नहीं सकता"

"क्यों बेफिजूल में बहस किए जा रही हो?"...

"एक बार कह तो दिया कि कुछ नहीं हुआ है"मैँ गुस्से से बोल उठा..

"हुँह!...एक तो तुम्हारी फिक्र करो और ऊपर से तुम्हारा गुस्सा सहो"..

"नहीं बताना है तो ना बताओ...तुम्हारी मर्ज़ी"...

"ये तो तुम कुछ परेशान से दिखे तो पूछ लिया वर्ना...मुझे कोई शौक नहीं है कि
बेफाल्तू में माथापच्ची करती फिरूँ"..

"एक तुम हो जो सारी बातें गोल कर जाते हो और एक अपने पड़ोसी शर्मा जी हैँ जो....

आते ही पानी बाद में पीते हैँ...सारी राम कहानी पहले बतियाते हैँ"...

"तुम्हें?"..

"मुझे क्यों बताने लगे?...अपनी घरवाली को बताते हैँ"...

"ओह!...फिर ठीक है"मेरे चेहरे पे इत्मिनान था

"कल ही तो देखा था उसे पड़ोस वाले कैमिस्ट से दवाई लेते हुए"...

"तो?"...

"अरे!...पेट कमज़ोर है स्साले का"...

"दस्त लगे रहते हैँ हमेशा...तभी तो कोई बात पचा नहीं सकता"...

"सुनो"...

"क्या?"...

"ज़रा कम्प्यूटर ऑन कर के नैट तो चलाना"...

"उफ...तौबा!...आप और...आप का कम्प्यूटर"..

"शाम होते ही इंतज़ार रहता है कि कब जनाब आएँ और कब कड़क चाय की प्याली और
बिस्कुट के साथ दो-चार प्यार भरी बातें हों"...

"कुछ मैँ इधर की कहूँ..कुछ आप उधर का हाल सुनाओ"...

"लेकिन आप हैँ कि..आते ही कम्प्यूटर ऑन करने को कह रहे हैँ"...

"कम्प्यूटर ना हुआ..मेरी सौत हो गया"...

"इस मुय्ये कम्प्यूटर से तो अच्छा था कि तुम सौत ही ला के घर पे बिठा देते तो
बढिया रहता"...

"वो कैसे?"...

"कम से कम लड़-झगड़ के ही सही...टाईम तो पास हो जाया करता मेरा"...

"यहाँ तो बस चुपचाप टुकुर-टुकुर ताकते रहो जनाब को कम्प्यूटर पे उँगलियाँ
टकटकाते हुए"...

"और तो जैसे कोई काम ही नहीं है मुझे"..

"अरे यार!..राखी सावंत का नया आईटम नम्बर आया है ना"...

"कौन सा?"...

"जो सबको क्रेज़ी किए जा रहा है"...

"उसी का विडियो डाउनलोड करना है"...

"क्यों?"...

"रिंकू ने मंगवाया है"..

"सब पता है मुझे कि रिंकू ने मंगवाया है या फिर पिंकू ने मंगवाया है"...

"अरे यार!...तुम तो खामख्वाह शक करती हो"...

"सच..उसी ने मंगवाया है"...

"कम से कम झूठ तो ऐसा बोलो कि पकड़ में ना आए"...

"क्यों अपने कमियों को छुपाने के लिए दूसरे का नाम ले ...उसे बदनाम करते
हो?"...

"कई बार तो देख चुकी हूँ कि खुद तुम्हारा मोबाईल उस कलमुँही की अधनंगी तस्वीरों
और विडियोज़ से भरा पड़ा है "..

"पता नहीं ऐसा क्या धरा है इस मुय्यी राखी की बच्ची में कि बच्चे बूढे सब उसी
पे लट्टू हुए जा रहे हैँ?"...

"मेरा बस चले तो अभी के अभी कच्चा चबा जाऊँ"...

"अरे!..तुम्हें क्या पता कि क्या गज़ब की आईटम है ...आईटम क्या पूरी बम्ब है
बम्ब"....

"उसका फिगर...उसकी सैक्स अपील...वल्लाह...क्या कहने"मैँ मन ही मन बुदबुदाया..

"अरे!..सब का सब नकली माल है"...

"उसका असल देख लो तो कभी फटकोगे भी नहीं उसके पास"मानो बीवी ने मेरे मन की बात
भांप ली थी....

"ट्रिंग..ट्रिंग"

"सुनो!...अगर कोई मेरे बारे में पूछे तो कह देना कि अभी आए नहीं हैँ"...

"क्यों?...क्या हुआ?...बात क्यों नहीं करना चाहते?"..

"कहा ना"...

"क्या?"..

"यही कि...कोई मेरे बारे में पूछे तो साफ मना कर देना"...

"हुँह!....खुद तो पहले से ही सौ झूठ बोलते हैँ और अब मुझसे भी बुलवा रहे हैँ"..

"समझा कर यार"मैँ रिकवैस्ट भरी नज़रों से देखता हुआ बोला....

"क्या समझूँ?"...

"प्लीज़"..

"ठीक है!...इस बार तो बोले देती हूँ लेकिन अगली बार नहीं "...

"ठीक है...अभी की मुसीबत तो निबटाओ"...

"हैलो.."..

"नमस्ते.."...

"जी.."..

"जी.."...

"अभी तो आए नहीं हैँ...आते ही मैसैज दे दूंगी

"ओ.के....बाय...ब्ब बॉय"...

"कौन था?"...

"वही..तुम्हारी माशूका...'कम्मो'....और कौन?"...

"तो फिर दिया क्यों नहीं फोन?"...

"तुमने खुद ही तो मना किया था"...

"इसके लिए थोड़े ही किया था"...

"और किसके लिए किया था?"...

"वो..वो...

"याद करो...तुमने ही कहा था कि जो कोई भी हो...साफ मना कर देना"...

"तुमसे तो बहस करना ही बेकार है"..

"अपने आप दिमाग नहीं लगा सकती थी क्या?"..

"गल्तियाँ तुम करो और भुगताऊँ मैँ?"...

"ओ.के बाबा!...तुम सही...मैँ गलत"....

"अब ठीक?"...

"हम्म"...

"तुम्हें पिछली बार भी समझाया था कि 'कम्मो' मेरी माशूका नहीं....बहन है"...

"सब पता है मुझे कि कौन किसकी कैसी बहन है?और...कौन किसका कैसा भाई है?"...

"मतलब?"मैँ आगबबूला हो उठा...

"सब जानते हो तुम"..

"ट्रिंग..ट्रिंग..."तभी फोन फिर घनघना उठा

"जो कोई भी मेरे बारे में पूछे ...साफ इनकार कर देना"...

"नहीं...बिलकुल नहीं"..

"पक्का..इस बार उसी का होगा"मैँ बड़बड़ाता हुआ बोला...

"किसका?"...

"प्लीज़...मुझे फोन मत देना"..

"तुम्हें मेरी कसम"...

"हुँह..."इतना कह बीवी फोन की तरफ बढ गई...

"हैलो"...

"कौन?"....

"ओह!...नॉट अगेन"कहते हुए बीवी ने फोन क्रैडिल पर रख दिया...

"किसका फोन था?"...

"पता नहीं...ऐसे ही कोई पागल है"...

"बार-बार फोन कर के तंग करता है"...

"कहता क्या है?"...

"कुछ नहीं"...

"मतलब?"...

"बस ऐसे ही ...ऊटपटांग बकता रहता है "...

"क्या?"...

"कुछ भी उल्टा-पुल्टा"...

"ज़रूर तुम्हारा कोई आशिक होगा"...

"मेरा?"...

"और नहीं तो मेरा?"..

"रहने दो...रहने दो...ये वेल्ला शौक मैँने नहीं पाला हुआ है"...

"तुमने नहीं पाला तो क्या?...उसने तो पाला हुआ है ना जो तुम्हें बारंबार फोन
करता है"...

"मुझे क्या पता?"

"कहीं से नम्बर मिल गया होगा"...

"अच्छा...अब ये बताओ कि तुम फोन उठाने से कतरा क्यों रहे थे?"...

"बस ऐसे ही"...

"फिर भी ..पता तो चले"...

"अरे!...वो 'घंटेश्वरनाथ बल्लमधारी' नाक में दम किए बैठा है"..

"तो उसी के डर से फोन स्विच ऑफ किए बैठे हैँ जनाब?"बीवी फोन उठा मुझे दिखाती
हुई बोली....

"यही समझ लो"...

"तुम तो ऐसे ही बेकार में हर किसी ऐरे गैरे नत्थू खैरे से डरते रहते हो"...

"वो कोई ऐरा गैरा नहीं है बल्कि एक माना हुआ नामी गिरामी साहित्यकार है"...

"तो तुम क्या चिड़ीमार हो?"...

"तुम भी तो एक उभरते हुए व्यंग्यकार हो ना?"...

"अरे!...वो पुराना चावल घिस-घिस के संवर चुका है इस साहित्य की लाईन में और मैँ
अभी नया खिलाड़ी हूँ"...

"लेकिन अब तो तुम्हारा भी थोड़ा-बहुत नाम हो चला है"...

"सो!..कमी किस बात की है?"...

"माना कि नाम हो चुका है लेकिन सिर्फ ब्लागजगत की दुनिया में"...

"तो क्या हुआ?"...

"क्या कमी है इस ब्लॉगिंग की वर्चुअल(आभासी)दुनिया में?"..

"इस ब्लॉगिंग की वजह से ही तुमने लिखना शुरू किया और...

इसी वजह से तुम में हौंसला आया कि अपने लिखे को अखबारों वगैरा में भेज के देखा
जाए"

"नतीजा सामने है...तुमने तीन रचनाएँ भेजी नवभारत टाईम्स वालों को और उन्होंने
बिना किसी कट के तीनों ही अप्रूव कर छाप दी"..

"अब तो खुद मेल भेज-भेज के दूसरी साईट वाले भी इंवाईट करते हैँ तुम्हें लिखने
के लिए"..

"बात तो तेरी ठीक है लेकिन नैट पे लिखना और बात है और किताबों और अखबारों में
छपना-छपाना और बात है"...

"लेकिन मैँने तो सुना है कि ब्लॉगिग भी साहित्य की ही एक नई विधा है और उससे
कहीं बेहतर है"...

"बात तो तेरी सोलह ऑने सही है...यहाँ हम अपनी मर्ज़ी के मालिक जो खुद होते
हैँ"..

"ब्लॉग में हम किसी सम्पादक का पब्लिशर की दया के मोहताज नहीं होते
क्योंकि...यहाँ कोई हमारी रचनाओं को खेद सहित नहीं लौटाता है"...

"और एक खूबी ये भी तो है कि हमें अपने लिखे पर कमैट भी तुरंत ही मिलने शुरू हो
जाते हैँ"..

"बिलकुल!...यहाँ लिखते के साथ ही पता चलना शुरू हो जाता है कि हमने सही लिखा या
फिर गलत"..

"इन्हीं सब खूबियों की वजह से ब्लॉगिंग साहित्य से बेहतर है ना?"...

"लेकिन कईयों के हिसाब ये ये खूबियाँ नहीं...कमियाँ हैँ"..

"ये सब उन्हीं नामचीनों के द्वारा फैलाया गया प्रापोगैंडा होगा जिनको तुम
ब्लॉगियों के चलते अपनी कुर्सी खतरे में नज़र आ रही होगी"...

"मैँ अभी हाल ही में कहीं पढा था कि बीबीसी के किसी बड़े अफसर ने कहा है कि...

हमें टीवी...अखबार...मैग्ज़ीनज़ के अलावा हर उस व्यक्ति से खतरा है जिसके पास एक
अदद कम्प्यूटर और नैट का कनैक्शन है"..

"बिलकुल सही कहा है"...

"तुम्हें पता है कि कई बार मीडिया की सुर्खियों में आने से भी बहुत पहले कुछ
खबरें ब्लॉगजगत में धूम मचा रही होती है"..

"जैसे?"..

"ये मोनिका लैवैंसकी और बिल क्लिंटन वाला काण्ड भी सबसे पहले नैट पे ही उजागर
हुआ था"...

"अच्छा?"..

"क्या ये सही है कि आजकल चीन के दमन के चलते तिब्बत से आने वाली लगभग हर खबर का
जरिया ब्लाग और इंटरनैट है?"...

"बिलकुल"...

"बाहरले मीडिया को जो खबरों के कवरेज की इज़ाज़त नहीं है"...

"और वहाँ का लोकल मीडिया तो सारी खबरें सैंसर होने के बाद ही दे रहा होगा?"..

"यकीनन"...

"आज हर बड़ी से बड़ी हस्ती का अपना ब्लॉग है..चाहे वो आमिर खान हो या फिर अमिताभ
बच्चन"...

"अच्छा?"...

"यहाँ उनकी भी वही अहमियत है जो मेरी है या फिर किसी भी अन्य ब्लॉगर की"..

"सीधी बात है कि जिसकी लेखनी में दम होगा...जिसका लिखा रुचिकर होगा उसी के पास
रीडर खिंचे चले आएँगे"..

"आमिर का तो मैँने सुना था लेकिन 'बच्चन साहब' को ब्लॉग बनाने की क्या
सूझी?"...

"अरे यार!..मीडिया में बहुत कुछ अंट संट बका जा रहा था ना उनके खिलाफ"..

"सो!...उसी चक्कर में अपना पक्ष रखने के लिए कोई ना कोई माध्यम तो चुनना ही था
उन्हें"...

"तो ऐसे में ब्ळॉग से बेहतर और भला क्या होता?"...

"हम्म!..ये बात तो है"...

"पता है...उनकी एक-एक पोस्ट के लिए पाँच-पाँच सौ से भी ज़्यादा रिप्लाई आ रहे
हैँ"...

"अरे वाह!...इसका मतलब कि यहाँ भी आते ही धूम मचा दी"..

"बिलकुल"..

"लेकिन एक कमी खल रही है उनके ब्ळॉग में मुझे"...

"क्या?"...

"हिन्दी भाषी होने के बावजूद..

हिन्दी फिल्मों की बदौलत नाम..काम...शोहरत और पैसा पाने के बावजूद...उन्होंने
अपना ब्लॉग अंग्रेज़ी में बनाया"...

"य्रे बिग बी का खिताब भी तो उन्हें हिन्दी फिल्मों की बदौलत ही मिला ना?"...

"अरे!..अंग्रेज़ी में ब्लॉग बनाने के पीछे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक अपनी बात
पहुँचाने की मंशा रही होगी उनकी"...

"तुम्हारे हिन्दी के ब्लॉग हैँ ही कितने?"..

"अभी तक तुम्हारे चार ब्लॉगों को मिला के कुल जमा छब्बीस सौ ही हैँ ना?"...

"माना कि फिलहाल छब्बीस सौ ब्लॉग ही है हिन्दी के लेकिन...

लगभग आठ महीने पहले इनकी संख्या सिर्फ 800 से 900 के बीच ही थी"...

"ये तो देखो कि कितनी तेज़ी से हम बढते जा रहे हैँ"...

"लेकिन अभी भी तुम दुनिया भर में फैले कुल ब्लॉगरों की संख्या का महज़ 0.03 % ही
हो"..

"तो क्या हुआ?"...

"बूंद बून्द से ही घड़ा भरता है"...

"आज छब्बीस सौ हैं तो क्या?"...

"आने वाले समय में छब्बीस हज़ार भी होंगे और ऊपरवाले ने चाहा तो एक ना एक दिन हम
छब्बीस लाख के आँकड़े को भी पार करेंगे"..

"चिंता ना करो...भविष्य हमारा उज्जवल है"..

"बड़े लोगों के इस ब्लॉगिरी की लाईन में कूदने से एक फायदा तो हुआ है"...

"वो क्या?"...

"यही कि कुछ साल पहले जिन सैलीब्रिटीज़ से रूबरू मिलने...उनसे बात करने की हम
कभी सपने में भी सोच भी नहीं सकते थे"..

"आज हम उनके ब्ळॉग पे कमैंट कर डाईरैक्ट अपने दिल की बात कह सकते हैँ"..

"ये बात तो है"..

"खैर!...उनकी छोड़ो...वो सब तो पहले से ही जाने माने लोग हैँ"...

"उनसे क्या मुकाबला?"...

"इस 'घंटेश्वरनाथ'की बात करो"...

"ये तो आम आदमी ही है ना?"..

"अरे!...इसका भी बड़ा नाम है आजकल"...

"चाहे कोई कवि सम्मेलन हो या फिर कोई मुशायरा...या फिर हो किसी नए पुराने
लिक्खाड़ की किताब का विमोचन"..

"हर जगह उसी को पूछा जाता है...उसी को बारंबार बुला कर मान-सम्मान दिया जाता
है"...

"अरे!..मान सम्मान दिया नहीं जाता बल्कि वो खुद ही सब कुछ अपने फेवर में
मैनुप्लेट करके अपना जुगाड़ बना लेता है"..

"रोज़ाना अखबारों...पत्रिकाओं...मैग्ज़ीनों ...पर्चों में उसका कोई ना कोई लेख
छपता रहता है"...

"तो क्या?"...

"उन्हीं में यदा कदा तुम्हारी कहानियाँ भी तो छपती हैँ ना?"...

"अरे..उसे लिखने के पैसे मिलते हैँ और मेरा माल मुफ्त में ही हड़प लिया जाता
है"...

"अफसोस तो इसी बात का है कि..जहाँ एक तरफ उसे मंच पे खाली बैठे बैठे पान चबाते
हुए जुगाली करने के भी पैसे मिलते हैँ ...

वहीं दूसरी तरफ तुमसे फोकट में कविता पाठ से लेकर मंच संचालन तक करा लिया जाता
है"..

"यही सोच के खुद को तसल्ली का झुनझुन्ना थमा देता हूँ कि चलो कम से कम इसी
बहाने मेरे काम की चर्चा तो होती है"...

"लेकिन ऐसी फोकट की चर्चा से फायदा क्या?"...

"कभी तो नोटिस में लिया जाएगा मेरा काम"...

"मुझे तो लगता है कि शर्म के मारे तुम खुद ही नहीं मांगते होगे"...

"बात तो तेरी कुछ-कुछ ठीक ही है"..

"अरे...बिना रोए कभी माँ ने भी बच्चे को दूध पिलाया है?"...

"जो लोग तुम्हें खुद ही पैसे देने लगे?"...

"हक है तुम्हारा...बेधड़क हो के माँग लिया करो"...

"इसमें शर्म काहे की?"...

"यार!...हिम्मत कर के पैसे मांगने की कभी कभार जुर्रत कर भी लो तो घंटेश्वरनाथ
का यही टका सा जवाब मिलता है कि...

शुक्र करो...हमारी बदौलत मीडिया की सुर्खियों में तो छाए हुए हो कम से कम"..

"अब अगर कहीं कोई प्रोग्राम हो तो मुझे ज़रूर ले चलना "..

"उसी से पूछूँगी कि ऐसी फोक्की सुर्खियों को क्या नमक बुरका के चाटें हम?"...

"खैर छोड़ो ये सब बातें...इस बात की तसल्ली है मुझे कि इसी बहाने मेरी खुद की
फैन फालोइंग बन गई है "...

"सही बात ..उसके जैसे चमचों के दम पर इकट्ठा की हुई भीड़ के बल पे नहीं कूदते हो
तुम"

"कोई डरने वरने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें उससे"...

"ज़्यादा चूँ-चाँ करे तो उसी के खिलाफ मोर्चा खोल देना"..

"अरे यार!...कैसे विरोध करूँ उसका?"..

"गुरू है वो मेरा"...

"गुरू गया तेल लेने"...

"कोई ऐसी अनोखी दीक्षा नहीं दी है तुम्हें उसने जो तुम पूरी ज़िन्दगी
गुरूदक्षिणा देते रहोगे"...

"तुम में जन्मजात गुण था लिखने का"...

"माँ जी बता रहती थी कि बचपन से ही पन्ने काले करते रहते थे"...

"वो बात तो ठीक है लेकिन मंच पे कविता पाठ का पहला चाँस तो उसी की बदोलत मिला
ना?"..

"हुँह!...चाँस दिया"...

"अपनी गर्ज़ को तुम्हें बुलवा लिया था"..

"ऐन टाईम पे उसका प्यादा जो बिमार पड़ गया था"..

"सो महफिल में रंग जमाने तुम्हें स्टैपनी बना तुम्हारा सहारा लिया था उसने"..

"हाँ ये बात तो है...मजबूरी थी उसकी ....आयोजकों से ब्याना जो पकड़ चुका था"...

"तुम जैसे सीधे-साधे लोगों को मोहरा बना अपना उल्लू सीधा करता है वो"..

"कोई ज़रूरत नहीं है फाल्तू उसके चक्करों में पड़ने की...अपना मस्त हो के काम
करो"...

"बड़े देखे हैँ ऐसे गुरू शूरू मैँने"..

"कई बार यही सोच-सोच के परेशान हो उठता हूँ कि आखिर कब तक उसके गुरुत्व की कीमत
चुकाता रहूँगा?"...

"आपको तो नाहक परेशान होने की आदत पड़ी हुई है"...

"खा थोड़े ही जाएगा हमें?"...

"एक काम करो...

"क्या?"...

"ऐसा सबक सिखाओ उसे कि छटी का दूध याद करते करते नानी भी याद आ जाए"..

"कैसे?"...

"अरे!..लेखक हो...कलम की ताकत को पहचानो...उसी से वार करो"...

"तुम जानती नहीं हो उसे....बहुत पहुँचा हुआ खुर्राट है वो"...

"एक बार में ही समझ जाएगा कि उसी के बारे में लिखा है मैँने"..

"तो क्या हुआ?"...

"समझ जाएगा तो समझ जाएगा"...

"कौन सा हम उसके गुँथे आटे की रोटियाँ पाड़ रहे हैँ?"..

"और वैसे भी कोई हम नाम थोड़े ही उसका लिखेंगे"...

"ऐसे तो चाहते हुए भी वो हमारा कुछ नहीं उखाड़ पाएगा"..

"बिलकुल!..खूब नमक मिर्च लगा के ऐसा तीखा मसालेदार लिखना कि बस तड़प के रह
जाए"...

"ऐसी-ऐसी बातें लिखना कि बिना खुल्लमखुल्ला खुलासा किए ही सब समझ जाएँ कि किसकी
बात हो रही है"...

"ऐसा करना ठीक रहेगा?"...

"क्यों?...वो क्या हमारे साथ सब ठीक ही करता आया है अब तक?"...

"पिछले तीन साल से हर सम्मेलन...हर मुशायरे...में उसी की तो बँधुआ गिरी कर रहे
हो"...

"देना-दिलाना कुछ होता नहीं है और जहाँ मन होता है...वहीं फटाक से फोन करके
बुलवा लेता है कि...

फलानी-फलानी जगह पे फलाने-फलाने टाईम पे पहुँच जाना"..

"ये नहीं कि किराए-भाड़े के नाम पे ही कुछ थमा दे"...

"हुँह!...टाईम का टाईम खोटी करो और ऑटो खर्चा भी पल्ले से भरो"...

"लेकिन मैँ तो बस से...

"तो क्या हर जगह अपनी गुरबत का ढिंढोरा पीट डालोगे?"...

"अरे ओ राजा हरीशचन्द्र की औलाद!...पर्सनली कौन जानता है तुम्हें इस कहानियों
की दुनिया में?"...

"थोड़ी बहुत गप भी तो मार सकते हो"...

"तुम्हें तो लिखना चाहिए कि मैँ ए.सी कार में सफर करता हूँ हमेशा और...

वो भी 'सी.एन.जी' वाली नहीं बल्कि 'पैट्रोल' वाली"...

"और हाँ!...एक बात का हर हालत में ध्यान रखना है कि. ...

कहानी के शुरू में और आखिर में मोटे-मोटे शब्दों में ये लिखना बिलकुल नहीं
भूलना कि ये कहानी पूर्ण रूप से काल्पनिक है"...

"इसका किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई भी...किसी भी तरह का संबध नहीं
है"..

"बाद में सौ लफड़े खड़े हो जाते हैँ...इसलिए पहले ही सावधानी बरत लो तो ज़्यादा
अच्छा है"..

"तुम्हारा कहा अक्षरश सही है लेकिन समझ नहीं आ रहा कि कहानी कहाँ से शुरू
करूँ?"...

"वहीं से जहाँ से उसने शुरूआत की थी"...

"मतलब...जब उसने शादी की....तब से?"...

"नहीं...उससे भी पहले से...जब वो हमेशा उस ऐंटीक माडल की टूटी साईकिल पे नज़र
आया करता था"....

"वही!..जो कई बार बीच रास्ते जवाब दे पंचर हो जाया करती थी?"...

"कई बार क्या?...हमेशा ही तो उसी को घसीटता नज़र आता था"...

"बल्कि यूँ कहो तो ज़्यादा अच्छा रहेगा कि वो साईकिल पे कम और साईकिल उस पे
ज़्यादा लदी नज़र आती थी"

"बिलकुल सही कहा"...

"ओ.के...ये प्वाईंट तो नोट कर लिया...अब आगे?"मैँ नोटबुक में कलम घिसता हुआ
बोला...

"वो सब बातें लिखना कि कैसे वो उल्टे सीधे दाव पेंच चलता हुआ...

एक मामुली कवि से आज साहित्य जगत की मानी हुई हस्ती बन बैठा है"...

"कैसे उसकी हाजरी के बिना हर महफिल सूनी-सूनी सी लगती है"..

"लेकिन ये उसकी तारीफ नहीं हो जाएगी?"...

"यही तो इश्टाईल होना चाहिए बिड्ड़ु...

मज़ा तो तब है जब तुम्हारे एक वाक्य के दो-दो मतलब निकलें"...

"किसी को लगे कि तुम तारीफ कर रहे हो और...किसी दूसरे लगे कि तुम जूतमपैजार कर
रहे हो"...

"लेकिन ऐसे किसी इनसान की इस तरह सरेआम पोल खोलना ठीक रहेगा?"...

"इनसान?"...

"अरे अगर सही मायने में इनसान होता तो आज अपने घर में रह रहा होता ना कि....

घर जमाई बन के अपने ससुर के बँगले पे कब्ज़ा जमा उन्हीं की रोटियाँ तोड़ रहा
होता"...

"सब जानती हूँ मैँ कि कैसे उसने उस मशहूर कवि की बेटी को अपने प्यार के जाल में
फँसा शादी का चक्कर चलाया"...

"शादी के पहले था ही क्या उसके पास?"..

"और अब ठाठ देखो पट्ठे के"..

"पहले ले दे के वही एक ही महीनों तक ना धुलने की वजह से सफेद से पीला पड़ा हुआ
कुर्ता पायजामा नज़र आता था उसके तन पे...

और अब...एक से एक फ्लोरोसैंट कलर के कुर्ते पायजामे जैकेट के साथ उसके बदन की
शोभा बढा रहे होते हैँ"...

"सुना है कि पूरे तीस सैट कुर्ते पायजामे सिलवा रखे हैँ पट्ठे ने"..

"खैर!..हमें क्या मतलब?"...

"तीस सिलवाए या फिर तीन सौ"...

"साफ कपड़े पहनने से कोई सचमुच अन्दर से साफ नहीं हो जाता ...रहेगा तो हमेशा ओछा
का ओछा ही"...

"ये सब आईडियाज़ तो नोट कर लिए मैँने...अब?"...

"ये भी लिखना नहीं भूलना कि कैसे वो अपने ब्लॉग के रीडरस और की संख्या बढाने के
लिए...

अपनी रचनाओं में सरासर सैक्स परोस रहा है"..

"मेरे ख्याल से ये लिखना ठीक नहीं रहेगा"..

"क्यों?"..

"क्योंकि...कहानी पे पकड़ बनाए रखने के लिए और ..मनोरंजन के लिहाज से कई बार ऐसा
करना ज़रूरी भी होता है"..

"मैँ खुद ऐसा कई बार कर चुका हूँ"..

"तुम तो ज़रा सा..हिंट भर ही देते हो ना?"...

"वो तो बिलकुल ही खुल्लमखुल्ला सब कुछ कह डालने से नहीं चूकता"...

"पर..."मेरे स्वर में असमंजस था...

"एक बात गांठ बाँध लो कि हमेशा दूसरों पे कीचड उछालना ज़्यादा आसान रहता है"...

"सो!..तुम भी बेधड़क हो के उछालो"..

"किसी ने टोक दिया तो?"

"मुँह ना नोच लूँगी उसका?"...

"एक मिनट में सबक ना सिखा दिया तो मेरा भी नाम संजू नहीं"...

"देखती हूँ कि कौन रोकता है तुम्हें?"बीवी अपनी साड़ी संभाल ब्लाउज़ की आस्तीन
ऊपर करती हुई बोली.....

"बस बस!...ये दम खम बचा के रखो...रात को एंजायमैंट के काम आएगा"मैँ हँसता हुआ
बोला

"हुँह!..तुम्हारे दिमाग में तो बस हर वक्त उल्टा-पुल्टा ही चलता रहता है"...

"अब समझी"....

"क्या?"...

"इसीलिए पूरे चौबीस दिनों से तुम्हारे से कोई कहानी नहीं लिखी गई"...

"तुम्हारी ढलती उम्र को देखते हुए ये बात अच्छी नहीं "...

"कौन सी बात?"...

"यही कि...आजकल तुम्हारा ध्यान लिखने-लिखाने के बजाय पुट्ठा सीधा डाउनलोड करने
की तरफ ज़्यादा रहता है"...

"अरे यार!...ऐसे ही मज़ाक में बोल दिया"...

"सब समझती हूँ मैँ तुम्हारे मज़ाक"...

"लग गया तो तीर ...नहीं तो तुक्का"मैँ मन ही मन बुदबुदाया...

"हाँ तो तुम क्या कह रही थी?"मैँ बात बदलते हुए बोला...

"मैँने तो यहाँ तक सुना है कि आजकल वो नए तौर तरीके अपना रहा है अपने विरोधियों
पछाड़ने के लिए"...

"कौन से तौर तरीके?"..

"सभागारों में ...थिएटरों में...मीटिंगो में ...सम्मेलनों में...मंचों
पर...बैठकों में...

यूँ समझ लो कि हर जगह उस जगह जहाँ दो चार जानने वाले मिल जाते हैँ बस शुरू हो
जाता है"...

"अपने विरोधियों को गालियाँ देना?"...

"हाँ"...

"अरे!...अगर तुम्हें शिकवे हैँ...शिकायतें हैँ तो...प्यार से...दुलार से उनका
हल ढूँढो ना"..

"ऐसे भी कहीं होहल्ले के बीच किसी के 'मोहल्ले' पर निकाली जाती है 'भड़ास'?"...

"पता नहीं कब अ&#