On Fri, Jul 18, 2008 at 1:46 PM, Pankaj Bengani <pbeng...@gmail.com> wrote: > दुख मेरा कोई नहीं चुराता.... औकात की बात है. :) > _________________________________________
विष्णु जी चुराए नहीं होंगे जो वे चुराने के लिए उपलब्ध हैं, पर मुझे नहीं लगता कि कोई अब इन्हें चुराना चाहेगा. अब जो करेगा हिम्मत वो डकैती ही डालेगा. अविनाश वाचस्पति
On 19/07/2008, विष्णु बैरागी <bairagivis...@gmail.com> wrote:
> आपके बताए चिटठे के लेख और कविताएं देखीं । क्या ये सारे लेख-कतिाएं > चुराई हुई हैं, मैं समझ नहीं पाया ।
> विष्णु
> On 18 जुला, 13:12, Ravishankar Shrivastava <raviratl...@gmail.com> > wrote: > > बहुत से हिन्दी (अंग्रेज़ी के तो ख़ैर अनगिनत होंगे,) चिट्ठे चुराए हुए यहां > प्रकाशित हैं-
अच्छा ही है , इज्ज़त बढेगी ! वो कहते हैं ना की " ठगे ठग और ठगाए ठाकुर" यही तस्सली है ! मेरा तो पूरा प्रोफाइल ही एक भाई ने बिना कांट छाँट के ही छाप मारा !
On 7/19/08, अविनाश वाचस्पति <avinashvachasp...@gmail.com> wrote:
> विष्णु जी > चुराए नहीं होंगे जो > वे चुराने के लिए उपलब्ध > हैं, > पर मुझे नहीं लगता > कि कोई अब इन्हें > चुराना चाहेगा. > अब जो करेगा > हिम्मत वो डकैती > ही डालेगा. > अविनाश वाचस्पति
> On 19/07/2008, विष्णु बैरागी <bairagivis...@gmail.com> wrote:
>> रविजी,
>> आपके बताए चिटठे के लेख और कविताएं देखीं । क्या ये सारे लेख-कतिाएं >> चुराई हुई हैं, मैं समझ नहीं पाया ।
>> विष्णु
>> On 18 जुला, 13:12, Ravishankar Shrivastava <raviratl...@gmail.com> >> wrote: >> > बहुत से हिन्दी (अंग्रेज़ी के तो ख़ैर अनगिनत होंगे,) चिट्ठे चुराए हुए >> यहां प्रकाशित हैं-