> अंक-11 (जुलाई 2008)
> [image: अंक-11 (जुलाई 2008)] <
http://www.nirantar.org/0708/cover> इस
> अंक में ख़ास [image: 140 अक्षरों की दुनिया: माइक्रोब्लॉगिंग]
> <
http://www.nirantar.org/0708/tech-deergha/microblogging>
> *140 अक्षरों की दुनिया: माइक्रोब्लॉगिंग*<
http://www.nirantar.org/0708/tech-deergha/microblogging>
> ब्लॉगिंग के बाद इंटरनेट पर एक और विधा ने जोर पकड़ा है। जी हाँ ट्विटर, पाउंस
> और प्लर्क के दीवाने अपने बलॉग छोड़ दीवाने हो चले हैं माईक्रोब्लॉगिंग के। *पैट्रिक्स
> *और *देबाशीष *कर रहे हैं इस लोकप्रिय तकनीक की संक्षिप्त पड़ताल जिसमें लोग
> फकत 140 अक्षरों में कभी अपने मोबाईल, कभी डेस्कटॉप तो कभी जालस्थल द्वारा अपना
> हालेदिल लिखे चले जाते हैं। [image: IDN करेंगे हिन्दी का नाम रोशन]
> <
http://www.nirantar.org/0708/nidhi>
> *IDN करेंगे हिन्दी का नाम रोशन* <
http://www.nirantar.org/0708/nidhi>
> जब जालपृष्ठ हिन्दी में है तो भला डोमेन नाम हिन्दी में क्यों नहीं? *अन्तरराष्ट्रीय
> डोमेन नाम (IDN)* द्वारा ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी इंटरनेट प्रयोक्ताओं को इसका हल
> तो मिला ही है, भविष्य में संपूर्ण डोमेन नाम अपनी भाषा में लिख सकने के मार्ग
> भी प्रशस्त हो रहे हैं। पढ़िये आइडीएन के बारे में विस्तृत जानकारी देता *वरुण
> अग्रवाल* का लिखा, रमण कौल द्वारा अनूदित लेख। [image: मनोचिकित्सा से
> फ़िल्म निर्देशन तक] <
http://www.nirantar.org/0708/samvaad>
> *मनोचिकित्सा से फ़िल्म निर्देशन तक*<
http://www.nirantar.org/0708/samvaad>
> *डॉ परवेज़ इमाम *ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी कर मनोचिकित्सक का पेशा
> अपनाया पर अस्पताल की बजाय उनकी कर्मभूमि बनी वृतचित्र यानि डाक्यूमेंट्री
> फ़िल्मों की दुनिया। टीवी कार्यक्रम टर्निंग प्वाईंट से शुरुवात कर उन्होंने अब
> तक अनेकों पुरस्कृत वृत्तचित्रों का निर्माण किया है। संवाद में पढ़ें परवेज़ के
> जीवन और अनुभव पर* डॉ सुनील दीपक *से हुई उनकी बातचीत।
> इस अंक के अन्य आकर्षण [image: कृषि आधार का बढ़ता भार]<http://www.nirantar.org/0708/cover>
> *कृषि आधार का बढ़ता भार* <http://www.nirantar.org/0708/cover>
> हर विकसित देश ने कालांतर में ग्राम-केन्द्रित, कृषि-केन्द्रित व्यवस्था से
> शहर-केन्द्रित, गैर-कृषि केन्द्रित व्यवस्था की ओर अन्तरण किया है। *अतानु दे
> * और *रुबन अब्राहम* मानते हैं कि भारत के पास विकल्प है कि वह 6 लाख छोटे
> गाँवों की बजाय 600 सुनियोजित, चमचमाते नए शहरों के निर्माण पर विचार करे। जबकि
> कृषक चिट्ठाकार *अशोक पाण्डेय* मानते हैं कि ऐसा कदम बाज़ार की ताकत के सामने
> गाँवों की आत्मनिर्भरता के घुटने टेक देने के समान होगा।
> ------------------------------
> [image: व्यतीत] <http://www.nirantar.org/0708/vatayan/kahani> *व्यतीत*<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/kahani>
> संस्कृतियों, लिबासों और भाषाओं के कॉकटेल कलकत्ता में नीता के सामने श्यामल
> है, उसका वर्तमान। श्यामल पहली बार आया है यहाँ, पर नीता का व्यतीत अतीत उसे
> साल रहा है। वह कलकत्ता को भूल जाना चाहती है। वातायन में पढ़िये 1963 में
> मनोरमा पत्रिका में प्रकाशित *वीणा सिन्हा* की स्त्री के अंतर्दंद्व पर लिखी
> कहानी जो आज भी सामयिक लगती है।
> ------------------------------
> [image: अमृता इमरोज़: रूहानी रिश्तों की बयानी]<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/samiksha/amrita-imroz>
> *अमृता इमरोज़: रूहानी रिश्तों की बयानी*<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/samiksha/amrita-imroz>
> *उमा त्रिलोक* ने अपनी किताब में इमरोज़ और अमृता की रूहानी मोहब्बत के
> जज़्बे को तो खूबसूरती से अभिव्यक्त किया ही है, साथ ही अमृता प्रीतम के जीवन
> के आखिरी लम्हों को भी अपनी कलम से बख़ूबी बटोरा है। पढ़िये पुस्तक अमृता इमरोज़
> की *रविशंकर श्रीवास्तव* व *रंजना भाटिया* द्वारा समीक्षायें।
> ------------------------------
> [image: मैं बोरिशाइल्ला : भीड़ से अलग]<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/samiksha/borishailla>
> *मैं बोरिशाइल्ला : भीड़ से अलग*<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/samiksha/borishailla>
> बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित "मैं बोरिशाइल्ला" *महुआ माजी* का
> पहला उपन्यास है जो चर्चित भी हुआ और सम्मानित भी। *रवि *कहते हैं कि थोड़ा
> बोझिल होने के बावजूद यह अलग सा उपन्यास अपने प्रामाणिक विवरण के कारण बांग्ला
> जनजीवन को जानने समझने वाले और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को दिलचस्प
> लगेगा।
> ------------------------------
> [image: सफल-असफल बनने की सत्य तथाकथा]<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/vyangya>
> *सफल-असफल बनने की सत्य तथाकथा*<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/vyangya>
> *रवि रतलामी *सफ़ल बनना चाहते थे, महान बनना चाहते थे। और खोजते खोजते उनका
> हाथ वो नुस्ख़ा लग ही गया जिससे वे महान ही नहीं, महानतम बन गये। तो देर किस
> बात की? आप भी बन जाइये उन के अनुयायी।
> ------------------------------
> [image: कितना बोलती हो सुनन्दा!]<http://www.nirantar.org/0708/vatayan/kavita>
> *कितना बोलती हो सुनन्दा!* <http://www.nirantar.org/0708/vatayan/kavita>
> वातायन के काव्य प्रभाग में पढ़िये युवा कवि *गौरव सोलंकी* की दो कवितायें।
> ------------------------------
> [image: देख तमासा]
...